फैज़ के गैर हिंदू होने पर बढ़ा विवाद
संवाददाता/in24 न्यूज़.
देश में आज जो स्थिति है, वह भले ही लोकतंत्र की अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत है, मगर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ ऐसे विवादित तथ्यों को भी सामने लेन की कोशिश की जा रही है जिससे सामाजिक सौहार्द पर असर पड़ता है. आजकल मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्म 'हम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे' को लेकर इनदिनों विवाद हो रहा है। कानपुर आईआईटी में इस पर जांच बिठा दी गई है। आरोप है कि यह हिंदू विरोधी है। कानपुर आईआईटी के छात्रों ने नागरिकता क़ानून के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान फ़ैज़ की इस नज्म का इस्तेमाल किया था। फैज की नज्म को समझने से पहले फैज को समझना पड़ेगा। फैज़ अहमद फैज़ का जन्म 13 फरवरी, 1911 में पंजाब के सियालकोट जिले (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू, अरबी तथा फ़ारसी में हुई जिसमें क़ुरआन को कंठस्थ करना भी शामिल था। मतलब कि वह हाफिज ए कुरआन भी थे। कहा जाता है कि जब वे जेल गए थे तब वे वहां कैदियों को कुरआन पढ़ाया करते थे। उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह सियालकोट वापस आ गए और यहां उन्होंने वकालत शुरू की। उनकी सोच साम्यवादी है जो उनकी गजलों और नज्मों में भी झलकती है। फैज़ अहमद फैज़ बेहद क्रांतिकारी थे और यही कारण था कि उन्हें काफी समय जेल में बिताना पड़ा था। बटवारे के बाद फैज़ ने पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठानी शुरू की। उन्होंने 1951 में लियाकत अली खान की सरकार के खिलाफ मौर्चा खोला। उन पर तख्तापलट की साजिश का आरोप लगाया गया और उन्हें 1951 से 1955 तक जेल हुई। 1977 में तत्कालीन आर्मी चीफ जिया उल हक ने पाकिस्तान में तख्ता पलट किया। जिया उल हक के शासन के खिलाफ फैज ने ‘हम देखेंगे' नज़्म लिखी थी। वे विचारों से साम्यवादी थे और पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। इसी कारण फ़ैज अहमद फ़ैज को 1963 में लेनिन शांति पुरस्कार मिला था। इतना ही नहीं उन्हें 1984 में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। अब बात करते है फैज अहमद की नज्म के बारे में......
हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
इस पंक्ति में शायर कहता है कि हम कयामत की उस मंजर को भी देखेंगे जिसका वादा खुदा ने किया है। और उसके बारे में पहले से लिख रखा है। फैज अहममद अगली पंक्ति में कहते हैं.......
जब जुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गराँ
रुई की तरह उड़ जायेंगे
हम महकूमो के पाँव-तले
जब धरती धड़ धड़ धड्केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ -कड़ कड़केगी
हम देखेंगे…
फैज का कहना है कि जुल्म कितना क्यों न हो एक दिन उसका अंत होता है। कयामत के दिन पहाड़ भी रुई की तरह उड़ जाएगा और लोगों के पांव तले जमीन भी खिसक जाएगी। साथ ही हाकिमों के सर के उपर खतरा मंडराएगा।
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
फिर वो दिन भी आएंगे जब अच्छे लोगों और वंचितों को मसनद पर बैठाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
इसमें फैज साफ तौर पर कहते हैं कि इस दुनिया में अल्लाह या इश्वर एक ही है। अल्लाह को आज तक किसी ने नहीं देखा है। लेकिन हर जगह मौजूद है। फ़ैज़ इस नज़्म में अनलहक़ के सूफ़ी नारे को भी शामिल करते हैं। अनलहक़ का मतलब होता है - मैं ही ख़ुदा हूँ। और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा, जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ भारतीय उपमहाद्वीप की उन बुलंद आवाज़ों में से हैं जिन्होंने प्रेम के साथ-साथ विद्रोह की भावना को भी खुल कर, बिना डरे अभिव्यक्त किया है। लोकतंत्र के सजग प्रहरी की तरह। जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हुआ तो आज़ादी के जश्न के बीच फ़ैज़ ही थे जिन्होंने अपनी नज़्म के ज़रिये अपनी उदासी जताई थी जो कहीं न कहीं उस दौर में गाँधी के अकेलेपन और मोहभंग से भी जुड़ती दिखती है।
ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़मे-दिल
वहीं फैज अहमद फैज की बेटी सलीमा हाशमी का कहना है कि वह इस नज्म के 'गैर हिंदू' होने पर हुए विवाद दुखी नहीं हैं, बल्कि यह बहुत फनी है। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके पिता के शब्द उन लोगों के लिए हमेशा मदद करेंगे जिन्हें अपनी बात कहने की ज़रूरत है।