यूपीआई पर शुल्क का रास्ता खुला, अर्थशास्त्री बोले- ग्राहक पर असर नहीं पड़ेगा कहना सही नहीं
यूपीआई को लेकर इन दिनों एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आने वाले समय में डिजिटल भुगतान के लिए शुल्क देना पड़ सकता है। संसद से कानून में बदलाव का रास्ता साफ होने के बाद बैंकों और भुगतान कंपनियों को कुछ यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, अभी कोई शुल्क लागू नहीं हुआ है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि आम ग्राहकों और व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले भुगतान पर शुल्क नहीं लगाया जाएगा। लेकिन अर्थशास्त्री अजीत रानाडे ने इस बात पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर व्यापारियों से शुल्क लिया जाता है तो उसका असर किसी न किसी रूप में ग्राहकों तक पहुंच सकता है।
दरअसल, यूपीआई के जरिए हर दिन करोड़ों लेनदेन होते हैं और छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबार तक इसका इस्तेमाल करते हैं। सरकार का कहना है कि ग्राहक पहले की तरह मुफ्त में यूपीआई का इस्तेमाल कर सकेंगे। वहीं, संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर का बोझ व्यापारियों पर पड़ सकता है। अभी इस शुल्क की अंतिम दर तय नहीं हुई है। शुरुआती चर्चाओं में 2,000 रुपये से ज्यादा के कुछ लेनदेन पर करीब 0.4 प्रतिशत तक शुल्क की बात सामने आई है, लेकिन यह सिर्फ चर्चा का हिस्सा है और अंतिम फैसला अभी बाकी है।
अर्थशास्त्री अजीत रानाडे का कहना है कि यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि व्यापारी शुल्क देंगे और ग्राहकों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनके मुताबिक, व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को खुद वहन कर सकते हैं या फिर सामान और सेवाओं की कीमत में इसका कुछ हिस्सा जोड़ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यूपीआई के तेजी से लोकप्रिय होने की एक बड़ी वजह यह थी कि इसके इस्तेमाल पर शुल्क नहीं लगता था। यूपीआई को चलाने में बैंक, भुगतान कंपनियां और दूसरी संस्थाएं सर्वर, सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने जैसी सेवाओं पर बड़ी रकम खर्च करती हैं।
हालांकि, सरकार की तरफ से अभी साफ किया गया है कि आम लोगों के लिए यूपीआई भुगतान मुफ्त रहेगा। संभावित एमडीआर मुख्य रूप से व्यापारियों से जुड़े लेनदेन पर लागू होने की बात कही जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, अगर सीमित लेनदेन पर शुल्क लगाया जाता है तो यूपीआई के ज्यादातर छोटे भुगतान इससे बाहर रह सकते हैं। इसलिए फिलहाल आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए तुरंत कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार शुल्क की दर कितनी तय करती है और इसे किन लेनदेन पर लागू किया जाता है। यूपीआई के संचालन और सुरक्षा की लागत बढ़ रही है, इसलिए इसके खर्च को पूरा करने के लिए नए तरीके तलाशे जा रहे हैं। दूसरी तरफ, विशेषज्ञों को डर है कि शुल्क बढ़ने से व्यापारियों की लागत बढ़ सकती है और इसका अप्रत्यक्ष असर ग्राहकों पर पड़ सकता है। फिलहाल कोई शुल्क लागू नहीं हुआ है और अंतिम नियम आने के बाद ही साफ होगा कि यूपीआई इस्तेमाल करने वालों और व्यापारियों पर इसका कितना असर पड़ेगा।