संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के हथियार नियंत्रण प्रस्ताव के पक्ष में रूस ने क्यों किया मतदान?
संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में पाकिस्तान और बेलारूस द्वारा पेश किए गए क्षेत्रीय हथियार नियंत्रण से जुड़े एक प्रस्ताव को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा छिड़ गई है। 193 सदस्यीय वैश्विक संस्था में इस गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव के पक्ष में 180 देशों ने मतदान किया, जबकि केवल भारत और इजरायल ने इसके खिलाफ अपना वोट दर्ज कराया। इस मतदान की सबसे बड़ी खास बात यह रही कि भारत के पारंपरिक और सबसे भरोसेमंद सहयोगी रूस के साथ-साथ अमेरिका और चीन ने भी पाकिस्तान के इस प्रस्ताव का समर्थन किया। रूस द्वारा भारत के रुख के विपरीत जाकर मतदान किए जाने के बाद राजनयिक गलियारों में दोनों देशों के संबंधों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करते हुए अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट किया है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनमोल शेर बेदी ने कहा कि पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण एक वैश्विक विषय है और इसे केवल किसी विशेष क्षेत्र या उप-क्षेत्र तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारत का स्पष्ट मानना है कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएं और सैन्य क्षमताएं केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं या पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनका दायरा काफी विस्तृत होता है। ऐसे में दक्षिण एशिया या किसी क्षेत्र विशेष के आधार पर हथियारों पर सीमा तय करने का कोई भी ढांचा भारत की व्यापक सुरक्षा प्राथमिकताओं के अनुकूल नहीं है।
रूस के इस कदम का विश्लेषण करते हुए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि उसके इस मतदान को भारत के खिलाफ या पाकिस्तान के समर्थन में किसी बड़े रणनीतिक बदलाव के रूप में देखना सही नहीं होगा। रूस पारंपरिक हथियार नियंत्रण से जुड़े वैश्विक प्रस्तावों पर हमेशा से ऐसा ही रुख अपनाता रहा है और उसने पिछले वर्षों में भी इसी तरह के मसौदों का समर्थन किया था। इसके अलावा यह प्रस्ताव केवल एक सामान्य सिफारिशी ढांचा प्रस्तुत करता है और इसमें भारत के रक्षा सौदों, हथियारों की खरीद या सैन्य क्षमताओं को सीमित करने वाला कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रावधान शामिल नहीं है। इसलिए रूस का यह फैसला उसकी अपनी बहुपक्षीय नीतियों का हिस्सा है, न कि भारत के साथ उसके रणनीतिक संबंधों में किसी प्रकार की दूरी का संकेत।
प्रस्ताव को मिले भारी समर्थन के बाद पाकिस्तान ने भले ही इसे अपनी कूटनीतिक सफलता बताया हो, लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी ऐसे क्षेत्रीय तंत्र को स्वीकार नहीं करेगा जो उसकी सुरक्षा आवश्यकताओं को सीमित करता हो। भारत की रक्षा खरीद, सेना के आधुनिकीकरण और वैश्विक रणनीतिक प्राथमिकताओं पर इस प्रस्ताव से कोई असर नहीं पड़ेगा। कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र में हुआ यह मतदान बहुपक्षीय मंचों पर विभिन्न देशों के सैद्धांतिक रुख को दर्शाता है, जिससे भारत और रूस के बीच दशकों पुराने मजबूत द्विपक्षीय रक्षा और राजनीतिक संबंधों पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।