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कर्नाटक के बादामी मंदिर में जूते पहनकर घुसी ASI कर्मचारी, टूरिस्ट से भिड़ंत का वीडियो वायरल"

07 Aug, 2026 10

कर्नाटक के प्रसिद्ध बादामी गुफा मंदिर में 19 मई 2026 को एक तीखी बहस हो गई। एक महिला टूरिस्ट ने आएसआई यानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की कर्मचारी रोशनी मुस्तफी को जूते पहनकर मंदिर परिसर में बैठे हुए देख लिया। टूरिस्ट ने तुरंत आपत्ति जताई और कहा कि ये धार्मिक भावनाओं का अपमान है। वीडियो में टूरिस्ट महिला कर्मचारी से सवाल करती दिख रही है कि "क्या स्टाफ होने की वजह से आप जूते पहनकर मंदिर में जा सकती हैं? क्या हम दरगाह में जूते पहनकर जाएंगे?" बहस इतनी बढ़ गई कि आएसआई कर्मचारी रोते हुए अपने सीनियर को फोन पर "सर यहां लोग तमाशा कर रहे हैं" कहती नजर आई। घटना के बाद वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और मंदिर की मर्यादा को लेकर नई बहस छिड़ गई।

ये घटना बागलकोट जिले के ऐतिहासिक मेनाबासिडी स्थल पर हुई, जो 6वीं सदी के बादामी गुफा मंदिरों का हिस्सा है। वीडियो में दिख रहा है कि टूरिस्ट महिला आएएसआई  कर्मचारी को जूते पहने देखकर गुस्सा हो गई। उसने सीनियर अधिकारियों से शिकायत की मांग की। कर्मचारी ने सफाई दी कि वो ड्यूटी के नियमों का पालन कर रही है और टूरिस्ट से कहा कि वो उच्च अधिकारियों से नियमों की जांच कर ले। बहस के दौरान आसपास लोग जमा हो गए और माहौल भावनात्मक हो गया। बाद में कर्मचारी ने माफी पत्र भी लिखा और खेद जताया जिसके बाद मामला शांत हुआ।

बादामी गुफा मंदिर कर्नाटक के सबसे पुराने और पवित्र स्थलों में से एक है। ये मंदिर हिंदू देवी-देवताओं और जैन तीर्थंकरों को समर्पित हैं और आएएसआई  के संरक्षण में आते हैं। आमतौर पर ऐसे धार्मिक स्थलों में जूते-चप्पल उतारकर प्रवेश की परंपरा रही है। टूरिस्ट का कहना था कि सरकारी कर्मचारी हों या आम लोग, सभी को इस नियम का पालन करना चाहिए। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने टूरिस्ट का समर्थन किया और कहा कि 6वीं सदी के इस धरोहर स्थल की पवित्रता बनाए रखना जरूरी है।


वीडियो वायरल होते ही ऑनलाइन बहस शुरू हो गई। एक पक्ष का कहना था कि मंदिर की मर्यादा सबके लिए बराबर है और स्टाफ को भी जूते उतारने चाहिए। दूसरे पक्ष ने सवाल उठाया कि वीडियो में कई टूरिस्ट भी जूते पहने दिख रहे हैं, तो सिर्फ कर्मचारी को क्यों टारगेट किया गया। कुछ यूजर्स ने कहा कि बादामी मंदिर अब पूरी तरह पूजा स्थल नहीं, बल्कि हेरिटेज साइट है इसलिए वहां गाइड तय करते हैं कि कहां जूते पहन सकते हैं। कुछ कमेंट्स में ये भी पूछा गया कि "क्या हिंदू महिला को मस्जिद या दरगाह में जूते पहनकर जाने दिया जाएगा?" आएएसआई  ने अभी तक स्टाफ के लिए जूते को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है।

विवाद बढ़ने के बाद आएएसआई  कर्मचारी रोशनी मुस्तफी ने पुरातत्व विभाग को माफी पत्र सौंपा और खेद जताया। इसके बाद मामला शांत हो गया। लेकिन ये घटना एक बार फिर दिखाती है कि धार्मिक स्थलों पर आचरण और हेरिटेज नियमों को लेकर कितना भ्रम है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि आएएसआई  को साफ गाइडलाइंस जारी करनी चाहिए कि कर्मचारियों और टूरिस्ट के लिए मंदिर परिसर में जूते का नियम क्या होगा। बादामी जैसी जगहें पर्यटन और आस्था दोनों से जुड़ी हैं, इसलिए संतुलन जरूरी है।

कर्नाटक के प्रसिद्ध बादामी गुफा मंदिर में 19 मई 2026 को एक तीखी बहस हो गई। एक महिला टूरिस्ट ने आएसआई यानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की कर्मचारी रोशनी मुस्तफी को जूते पहनकर मंदिर परिसर में बैठे हुए देख लिया। टूरिस्ट ने तुरंत आपत्ति जताई और कहा कि ये धार्मिक भावनाओं का अपमान है। वीडियो में टूरिस्ट महिला कर्मचारी से सवाल करती दिख रही है कि "क्या स्टाफ होने की वजह से आप जूते पहनकर मंदिर में जा सकती हैं? क्या हम दरगाह में जूते पहनकर जाएंगे?" बहस इतनी बढ़ गई कि आएसआई कर्मचारी रोते हुए अपने सीनियर को फोन पर "सर यहां लोग तमाशा कर रहे हैं" कहती नजर आई। घटना के बाद वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और मंदिर की मर्यादा को लेकर नई बहस छिड़ गई।

ये घटना बागलकोट जिले के ऐतिहासिक मेनाबासिडी स्थल पर हुई, जो 6वीं सदी के बादामी गुफा मंदिरों का हिस्सा है। वीडियो में दिख रहा है कि टूरिस्ट महिला आएएसआई  कर्मचारी को जूते पहने देखकर गुस्सा हो गई। उसने सीनियर अधिकारियों से शिकायत की मांग की। कर्मचारी ने सफाई दी कि वो ड्यूटी के नियमों का पालन कर रही है और टूरिस्ट से कहा कि वो उच्च अधिकारियों से नियमों की जांच कर ले। बहस के दौरान आसपास लोग जमा हो गए और माहौल भावनात्मक हो गया। बाद में कर्मचारी ने माफी पत्र भी लिखा और खेद जताया जिसके बाद मामला शांत हुआ।

बादामी गुफा मंदिर कर्नाटक के सबसे पुराने और पवित्र स्थलों में से एक है। ये मंदिर हिंदू देवी-देवताओं और जैन तीर्थंकरों को समर्पित हैं और आएएसआई  के संरक्षण में आते हैं। आमतौर पर ऐसे धार्मिक स्थलों में जूते-चप्पल उतारकर प्रवेश की परंपरा रही है। टूरिस्ट का कहना था कि सरकारी कर्मचारी हों या आम लोग, सभी को इस नियम का पालन करना चाहिए। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने टूरिस्ट का समर्थन किया और कहा कि 6वीं सदी के इस धरोहर स्थल की पवित्रता बनाए रखना जरूरी है।

वीडियो वायरल होते ही ऑनलाइन बहस शुरू हो गई। एक पक्ष का कहना था कि मंदिर की मर्यादा सबके लिए बराबर है और स्टाफ को भी जूते उतारने चाहिए। दूसरे पक्ष ने सवाल उठाया कि वीडियो में कई टूरिस्ट भी जूते पहने दिख रहे हैं, तो सिर्फ कर्मचारी को क्यों टारगेट किया गया। कुछ यूजर्स ने कहा कि बादामी मंदिर अब पूरी तरह पूजा स्थल नहीं, बल्कि हेरिटेज साइट है इसलिए वहां गाइड तय करते हैं कि कहां जूते पहन सकते हैं। कुछ कमेंट्स में ये भी पूछा गया कि "क्या हिंदू महिला को मस्जिद या दरगाह में जूते पहनकर जाने दिया जाएगा?" आएएसआई  ने अभी तक स्टाफ के लिए जूते को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है।

विवाद बढ़ने के बाद आएएसआई  कर्मचारी रोशनी मुस्तफी ने पुरातत्व विभाग को माफी पत्र सौंपा और खेद जताया। इसके बाद मामला शांत हो गया। लेकिन ये घटना एक बार फिर दिखाती है कि धार्मिक स्थलों पर आचरण और हेरिटेज नियमों को लेकर कितना भ्रम है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि आएएसआई  को साफ गाइडलाइंस जारी करनी चाहिए कि कर्मचारियों और टूरिस्ट के लिए मंदिर परिसर में जूते का नियम क्या होगा। बादामी जैसी जगहें पर्यटन और आस्था दोनों से जुड़ी हैं, इसलिए संतुलन जरूरी है।

 

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