सुप्रीम कोर्ट में 10 हजार, हाईकोर्ट में 80 हजार केस 30 साल से लंबित, कानून मंत्री ने बताई वजह
देश की न्यायपालिका में लंबित मामलों का अंबार एक बार फिर चर्चा में है। कानून और न्याय मंत्री ने संसद में बताया कि सुप्रीम कोर्ट में करीब 10 हजार मामले ऐसे हैं जो पिछले 10 सालों से लंबित हैं। वहीं देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 80 हजार से ज्यादा मामले 30 साल से भी ज्यादा समय से फैसले का इंतजार कर रहे हैं। मंत्री के इस बयान के बाद न्यायिक प्रणाली की कार्यप्रणाली और देरी के कारणों पर सवाल उठने लगे हैं। आम आदमी के लिए न्याय में देरी का मतलब न्याय न मिलना जैसा है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 अप्रैल 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में कुल 80 हजार से ज्यादा मामले लंबित थे। इनमें से 10 हजार मामले 10 साल से पुराने हैं। वहीं 25 उच्च न्यायालयों में कुल 60 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें से 80 हजार मामले 30 साल से ज्यादा पुराने हैं। सबसे ज्यादा लंबित मामले इलाहाबाद, पटना, बॉम्बे और कलकत्ता उच्च न्यायालय में हैं। जिला अदालतों की स्थिति और भी खराब है। वहां 4 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं।
देरी के पीछे क्या कारण हैं?
कानून मंत्री ने क्या कहा 1. न्यायाधीशों की कमी: देश में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों में से लगभग 20-25% पद खाली हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में कॉलेजियम द्वारा नाम भेजे जाने के बाद भी नियुक्तियों में देरी होती है।
2. मामलों की बाढ़: हर साल लाखों नए मामले दायर होते हैं, लेकिन निपटारे की गति इतनी तेज नहीं है।
3. जटिल कानूनी प्रक्रिया: अपील, पुनर्विचार याचिका और तारीखों पर तारीख मिलने से मिलने खींचते हैं।
4. गवाहों और सबूतों की कमी: कई बार गवाह समय पर नहीं आते या सबूत पूरे नहीं होते, जिससे सुनवाई चलती रहती है।
5. अवसंरचना की कमी: कई अदालतों में जजों के लिए पर्याप्त कोर्टरूम, स्टाफ और तकनीक नहीं है।
सरकार क्या कर रही है?
मंत्री ने कहा कि सरकार न्यायपालिका में सुधार के लिए कई कदम उठा रही है:
1. ई-कोर्ट मिशन: सभी अदालतों को डिजिटल किया जा रहा है ताकि फाइलें ऑनलाइन चलें और समय बचे।
2. फास्ट ट्रैक कोर्ट: जघन्य अपराध, महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों के लिए विशेष अदालतें बनाई गई हैं।
3. वैकल्पिक विवाद निवारण: मध्यस्थता और लोक अदालतों के जरिए मामलों को कोर्ट के बाहर सुलझाने पर जोर।
4. न्यायाधीशों की नियुक्ति: कॉलेजियम के साथ मिलकर खाली पदों को भरने की प्रक्रिया तेज की गई है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना है, "सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी। हमें केस मैनेजमेंट सिस्टम सुधारना होगा। अनावश्यक स्थगन पर रोक लगनी चाहिए।"
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मुकुल मुद्गल का मानना है कि "लोगों को भी जागरूक होना होगा। छोटे-छोटे विवाद कोर्ट जाने के बजाय आपसी बातचीत से सुलझाएं।"
आम जनता पर असर
लंबित मामलों का सबसे ज्यादा असर आम आदमी पर पड़ता है। एक जमीन विवाद, तलाक या नौकरी का मामला 10-15 साल तक चलता है। इस दौरान लोगों का पैसा, समय और मानसिक शांति सब खत्म हो जाता है। कई बार वादी की मृत्यु हो जाती है और केस उनके वारिस लड़ते हैं।