महाराष्ट्र में छिड़ा भाषा पर संग्राम, मराठी भाषा का ज्ञान नहीं तो लाइसेंस होगा रद्द
किसी भी राज्य की भाषा और संस्कृति उसकी पहचान होती है। उसका सम्मान निश्चित रूप से होना चाहिए। लेकिन महाराष्ट्र में इन दिनों एक बार फिर भाषा को लेकर तनातनी देखने को मिल रही है। महाराष्ट्र में मराठी और हिंदी भाषा को लेकर विवाद काफी समय से चला आ रहा है। मराठी भाषा के नाम पर हिंदी भाषी लोगों के साथ मारपीट और गाली-गलौज की घटनाएं सामने आती रही है।
महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता के नाम पर सियासी रोटी सेकने का प्रयास किया जाता रहा है। इतना ही नहीं भाषा के नाम पर गुंडागर्दी भी खूब देखने को मिली है। पहले भाषा के नाम पर गैर मराठी लोगों को मारा-पीटा जाता था। यूपी-बिहार वालों को मराठी न बोलने पर भगाया जाता था। फिर वही गुंडागर्दी हिंदी भाषा को लेकर की गई। दरअसल पहले मराठी नहीं आने पर पीटा गया। फिर हिंदी बोलने वालों को मारा जाने लगा।
वहीं अब महाराष्ट्र सरकार के मंत्री प्रताप सरनाईक की एक घोषणा से राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र में एक बार फिर भाषा पर बवाल मचा हुआ हुआ है। दरअसल महाराष्ट्र सरकार की तरफ से 1 मई से सभी लाइसेंसधारी ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किया गया है। इस फैसले के तहत ड्राइवरों को राज्य के 59 क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों में जांच के दौरान मराठी पढ़ना और लिखना आना चाहिए। नहीं तो उनका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। वहीं इस फैसले का रिक्शा चालक विरोध कर रहे हैं। रिक्शा यूनियनों का कहना है कि ये नियम उन हजारों ड्राइवरों के लिए खतरा है जो गैर-मराठी भाषी हैं, विशेष रूप से मुंबई महानगर क्षेत्र में जहाँ लगभग 75 फीसदी ड्राइवर हिंदी भाषी हैं।
नए नियमों के अनुसार, यदि कोई चालक मराठी भाषा की परीक्षा में विफल होता है, तो उसका ड्राइविंग लाइसेंस और परमिट रद्द किया जा सकता है। वहीं यूनियनों का सवाल है कि यदि परिवहन विभाग ने पहले ही गैर-मराठी भाषियों को लाइसेंस जारी किए थे, तो अब अचानक उन्हें काम करने से कैसे रोका जा सकता है, जबकि उन्होंने परमिट के लिए बड़ी रकम निवेश की है। भेदभावपूर्ण नियम बताते हुए ड्राइवरों का तर्क है कि वे पहले से ही पुलिस सत्यापन और स्थानीय निवास संबंधी नियमों का पालन करते हैं। साथ ही, इसी तरह के नियम ऐप-आधारित कैब या ई-बाइक टैक्सी ऑपरेटरों पर कड़ाई से लागू नहीं किए जा रहे हैं।
यूनियन का मानना है कि यात्रियों के साथ संवाद के लिए मराठी का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन इसे रोजगार के लिए अनिवार्य शर्त नहीं बनाया जाना चाहिए। आपको बता दें कि इस घोषणा पर विपक्षी दलों, यूनियनों और कई राजनीतिक संगठनों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जिससे यह मुद्दा पहचान, शासन और रोजगार से जुड़ी बहस में बदल गया है। विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं, जबकि मनसे जैसी पार्टियां मराठी भाषा के सम्मान के नाम पर इस फैसले का समर्थन कर रही हैं।
महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि मराठी भाषा का सम्मान जरूरी है, लेकिन इसके आधार पर लाइसेंस रद्द करना एक अत्यधिक कठोर कदम है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह फैसला राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकता है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता संदीप देशपांडे ने भी इस घोषणा के समय पर सवाल उठाते हुए इसे सरकार की अचानक जागृति करार दिया।
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर ये सुनिश्चित करेगी कि इस नीति को सार्थक रूप से लागू किया जाए और ये केवल प्रतीकात्मक कदम बनकर न रह जाए। वहीं शिवसेना नेता संजय निरुपम ने भी महाराष्ट्र सरकार से इस फैसले पर फिर से विचार करने और टूटी-फूटी या कामचलाऊ मराठी बोलने वालों को छूट देने की अपील की है। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को लिखे एक पत्र में निरुपम ने कहा कि प्यार से सिखाई जाने वाली भाषा जीवित रहती है, जबकि जबरदस्ती थोपी जाने वाली भाषा केवल डर पैदा करती है। निरुपम ने सवाल उठाया कि जब रिलायंस और बिरला जैसी बड़ी कंपनियों या जोमैटो-स्विगी के डिलीवरी पार्टनर्स पर मराठी बोलने का दबाव नहीं है, तो केवल गरीब रिक्शा चालकों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? निरुपम ने इस फैसले को सरासर अन्याय बताया है।
संजय निरुपम ने तर्क दिया कि रिक्शा और टैक्सी चलाने वाले लोग आमतौर पर उच्च शिक्षित नहीं होते। ऐसे में उनसे मराठी लिखने, पढ़ने और बोलने की परीक्षा लेना और फेल होने पर उनका परमिट रद्द करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। संजय निरुपम ने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि देश का कोई भी नागरिक कहीं भी जाकर अपनी आजीविका कमाने के लिए स्वतंत्र है। उन्होंने कहा कि हम सभी हिंदू हैं और भारत के नागरिक हैं। भाषा, जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव करना राज्य के संविधान के विरुद्ध है।
महाराष्ट्र सरकार का काम मराठी का संरक्षण करना है, लेकिन इसे दमन का जरिया नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय लोगों को मराठी सिखाने के लिए व्यवस्था करनी चाहिए। निरुपम ने तर्क दिया कि जिन ड्राइवरों की मातृभाषा मराठी नहीं है, उनके लिए परीक्षा थोपना उनके रोजगार पर असर डाल सकता है। उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि मराठी भाषा के प्रति सम्मान, उस पर गर्व और उसका संरक्षण हम सभी के दिलों में गहराई से बसा हुआ है।
हालांकि, भाषा के प्रति प्रेम पर कठोर नियम थोपना और इसके लिए परीक्षा अनिवार्य करना हजारों मेहनती ऑटो रिक्शा चालकों के जीवन के लिए नुकसान देने वाला साबित हो सकता है। मुंबई जैसे मल्टीकल्चरल महानगर में, 70 प्रतिशत से अधिक ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालक गुजरात, उत्तर भारत, पंजाब और दक्षिण भारत के विभिन्न हिस्सों से आते हैं.। शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कहा कि उन्होंने कड़ी मेहनत के दम पर शहर में अपनी जगह बनाई है और अपने परिवारों का पालन-पोषण कर रहे हैं, साथ ही मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। निरुपम ने आगे कहा कि ऐसे समय में ये फैसला उनके रोजगार पर लटकती तलवार के समान है। जिससे ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के दिलों में डर और असंतोष बढ़ रहा है।
वहीं राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने इस फैसले के समर्थन में मुंबई के उपनगरों में मोर्चा संभाल लिया है। मनसे ने ऑटो रिक्शा पर स्टिकर लगाकर अभियान शुरू किया है, जिस पर लिखा है- मैं मराठी बोलता हूं, मैं मराठी समझता हूं, आइए और मेरे रिक्शा में बैठिए। मनसे के नेताओं का कहना है कि सालों से मुंबई में रह रहे कई उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय लोग मराठी बोलना जानते हैं, लेकिन जो लोग इस नियम का विरोध कर रहे हैं, उन्हें मनसे स्टाइल में सबक सिखाया जाएगा। वहीं मुंबई डब्बेवाला एसोसिएशन ने भी परिवहन विभाग के इस निर्णय का स्वागत किया है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष सुभाष तळेकर कहा कि रिक्शा चालकों को ये समझना चाहिए कि वे महाराष्ट्र में अपना व्यवसाय कर रहे हैं और उनका रोजाना का संपर्क मराठी भाषी लोगों से होता है, इसलिए उन्हें मराठी भाषा सीखनी ही चाहिए। तळेकर ने अपना उदाहरण देते हुए कहा, मुंबई के डब्बेवाले खुद मराठी हैं, लेकिन काम के दौरान वे ग्राहकों की सुविधा के लिए हिंदी और गुजराती भी बोलते हैं। आखिर यह व्यवसाय का हिस्सा है। उन्होंने सलाह दी कि आंदोलन की भाषा अपनाने के बजाय रिक्शा चालकों को कम से कम मराठी का बुनियादी ज्ञान जरूर हासिल करना चाहिए।
वहीं मराठी अनिवार्यता के फैसले से नाराज होकर, ऑटो रिक्शा चालकों का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ ट्रेड यूनियनों ने 4 मई से स्टेट-वाइ़ड आंदोलन शुरू करने की धमकी दी है। ऑटो रिक्शा चालक-मालिक संयुक्त कृति समिति ने कहा कि यदि 28 अप्रैल तक ये फैसला वापस नहीं लिया जाता है तो 4 मई 2026 से राज्य भर में विरोध प्रदर्शन शुरू किया जायेगा। इस प्रदर्शन में राज्य के करीब 15 लाख ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों के शामिल होने की संभावना है। वहीं अमित ठाकरे ने गैर-मराठी रिक्शा चालकों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर आंदोलन के दौरान किसी मराठी व्यक्ति को परेशानी हुई, तो सड़कों पर पीटेंगे।
अमित ठाकरे ने कहा कि सरकार द्वारा लिया गया फैसला पूरी तरह सही है और इससे किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी। उन्होंने हड़ताल की चेतावनी देने वालों को भी चुनौती देते हुए कहा कि जिन्हें हड़ताल पर जाना है, वे जाएं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मराठी रिक्शा चालक सक्षम हैं और जरूरत पड़ने पर वे देर रात तक सेवा देंगे, ताकि आम जनता को किसी प्रकार की परेशानी न हो। अमित ठाकरे कहा कि मराठी लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और जो लोग मराठी भाषा जानते हैं, उन्हें भी आगे रखा जाना चाहिए। वहीं जो लोग मराठी सीखने से इनकार करते हैं, उन्हें प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।
मुंबई और आसपास के इलाकों से एमएनएस कार्यकर्ताओं और कुछ रिक्शा चालकों के बीच झड़प और नोकझोंक की खबरें सामने आई हैं। कई स्थानों पर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा है। हालांकि सरकार का कहना है कि ये निर्णय यात्रियों की सुविधा और स्थानीय भाषा में बेहतर संवाद के उद्देश्य से लिया गया है। अधिकारियों के मुताबिक, मराठी भाषा का ज्ञान सेवा क्षेत्र में संवाद को आसान बनाता है और यह किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए है।
मराठी भाषी स्थानीय लोग नौकरियों में अन्य राज्यों से आए लोगों के कारण अपनी पहचान खोने के डर से मराठी को अनिवार्य करने का समर्थन करते हैं। जबकि उत्तर भारतीय नेताओं और कई विपक्षी दलों का कहना है कि ये कदम क्षेत्रवाद को बढ़ावा देता है और इससे समाज में विभाजन पैदा हो सकता है। वहीं इतिहास को उठाकर देखें तो महाराष्ट्र में भाषा का मुद्दा केवल भाषाई नहीं, बल्कि सत्ता, पहचान की राजनीति, रोजगार के अवसरों और वोट बैंक को प्रभावित करने का एक बड़ा उपकरण बन गया है। महाराष्ट्र में भाषा की राजनीति दशकों पुरानी है, जो "मराठी अस्मिता" और भाषाई पहचान के इर्द-गिर्द घूमती है।
महाराष्ट्र में भाषा की राजनीति 1950 के दशक के संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन से शुरू हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप 1 मई 1960 को भाषाई आधार पर महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ था। कुल मिलाकर, मराठी भाषा को अनिवार्य करने का ये मुद्दा अब महाराष्ट्र की राजनीति का बड़ा केंद्र बन गया है। वहीं आने वाले दिनों में इस पर सियासत और तेज होने की संभावना है, जबकि सरकार के सामने संतुलन बनाए रखने और कानून-व्यवस्था को संभालने की चुनौती बनी हुई है।