फतेहपुर की गलियों से जंतर-मंतर तक जेनअल्फा मूवमेंट की नई आवाज
देश में पहली बार " जन अल्फा " नाम से एक बड़ा युवा आंदोलन खड़ा हुआ है। इस आंदोलन की चिंगारी फतेहपुर के एक छोटे से स्कूल से निकली थी और अब ये आग दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंच गई है। 2010 के बाद पैदा हुई पीढ़ी खुद को " जन अल्फा " कहती है। इनका कहना है कि दुनिया बदल गई है, लेकिन शिक्षा, नीतियां और सिस्टम आज भी 20 साल पुराने तरीके से चल रहे हैं। इसी गुस्से को लेकर हजारों स्टूडेंट्स सड़कों पर उतर आए हैं। इस आंदोलन के 3 चेहरे आज पूरे देश में फेमस हो गए हैं - फतेहपुर के अभिजीत, सोशल मीडिया क्रिएटर दीपके और दिल्ली में धरने का नेतृत्व कर रहे अंकुर सोनकर।
जन अल्फा का सबसे बड़ा मुद्दा शिक्षा है। उनका कहना है कि रट्टा मारो और नंबर लाओ वाला सिस्टम अब फेल हो चुका है। उन्हें AI, कोडिंग, फाइनेंशियल लिटरेसी और मेंटल हेल्थ जैसे विषय स्कूल में चाहिए। अभिजीत ने फतेहपुर में पहले प्रोटेस्ट में कहा था, "हम 2026 में पढ़ रहे हैं लेकिन 1996 का सिलेबस।" आंदोलनकारी चाहते हैं कि हर 2 साल में सिलेबस अपडेट हो, बोर्ड एग्जाम का बोझ कम हो और स्किल बेस्ड एजुकेशन को बढ़ावा मिले।
ये पहली पीढ़ी है जो फोन और इंटरनेट के साथ पैदा हुई है। लेकिन दीपके का आरोप है कि सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों का डेटा चुराती हैं और साइबर बुलिंग पर कोई रोक नहीं है। जन अल्फा मांग कर रहा है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त गाइडलाइन बने। स्कूलों में साइबर सिक्योरिटी की पढ़ाई हो और ऑनलाइन फ्रॉड से बचने के लिए सरकार कानून लाए। दीपके ने अपने 2 मिलियन फॉलोअर्स के साथ इस मांग को वायरल कर दिया।
पेपर लीक, कंपटीशन, पैरेंट्स का प्रेशर - इन सबकी वजह से स्टूडेंट्स डिप्रेशन में जा रहे हैं। अंकुर सोनकर ने जंतर-मंतर पर कहा, "हम मशीन नहीं हैं।" आंदोलन की मांग है कि हर स्कूल-कॉलेज में फ्री काउंसलर हो, हफ्ते में 1 दिन "नो होमवर्क डे" हो और एग्जाम के समय स्ट्रेस मैनेजमेंट वर्कशॉप कराई जाए। उनका नारा है - " मार्क्स नहीं, माइंड मैटर्स
जन अल्फा कहती है कि 2050 में दुनिया कैसी होगी इसका फैसला आज लिया जा रहा है, लेकिन उस फैसले में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। इसलिए वो प्लास्टिक बैन, क्लीन एनर्जी और पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि "हमारा भविष्य बेचकर आप आज की राजनीति मत करो।"
सबसे पहले जून 2026 में फतेहपुर के एक सरकारी स्कूल में अभिजीत ने 50 बच्चों के साथ "पुराना सिलेबस जलाओ" का सांकेतिक विरोध किया। उसका 30 सेकंड का वीडियो दीपके ने इंस्टा पर डाला और 24 घंटे में 5 करोड़ व्यूज आ गए।
उसके बाद देशभर के स्कूल-कॉलेज के बच्चों ने #WeAreGenAlpha हैशटैग से अपने वीडियो डालने शुरू कर दिए। महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान तक में छोटे-छोटे प्रोटेस्ट हुए।
जब सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया तो अंकुर सोनकर ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर 10 दिन के धरने का ऐलान किया। अभी वहां 200 से ज्यादा छात्र अलग-अलग राज्यों से आकर बैठे हैं। वो रोज सुबह असेंबली करते हैं, शाम को कैंडल मार्च निकालते हैं।
कौन हैं ये 3 लीडर ?
1. अभिजीत - फतेहपुर का जमीनी चेहरा
17 साल का अभिजीत 12वीं का स्टूडेंट है। वो कहता है कि उसके स्कूल में 3 महीने से साइंस टीचर नहीं है। उसी गुस्से में उसने आंदोलन शुरू किया। आज वो गांव-गांव जाकर बच्चों को जोड़ रहा है।
2. अभिजीत दीपके - डिजिटल आवाज
22 साल का दीपके एजुकेशन कंटेंट क्रिएटर है। उसने ही इस आंदोलन को ट्विटर, इंस्टा और यूट्यूब पर ट्रेंड कराया। उसका कहना है "अगर सरकार टीवी पर नहीं सुनेगी तो हम रील्स से सुनवाएंगे।"
3. अंकुर सोनकर - दिल्ली का संयोजक
24 साल के अंकुर डीयू के छात्र हैं। वो पिछले 2 साल से स्टूडेंट पॉलिटिक्स में हैं। जंतर-मंतर पर वही रोज सरकार से बातचीत की मांग कर रहे हैं और आंदोलन को अनुशासित रख रहे हैं।
अभी तक शिक्षा मंत्रालय ने सिर्फ इतना कहा है कि "हम छात्रों की मांगों पर विचार कर रहे हैं।" लेकिन कोई ठोस कमेटी नहीं बनी है। एजुकेशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि जन अल्फा की 70% मांगें जायज हैं। उनका कहना है कि अगर सरकार अभी नहीं मानी तो 2029 के चुनाव में ये वोटर सबसे बड़ा फैक्टर बनेंगे।